अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
महज़ ख़्वाबों ख़यालों में तिरा दीदार हो कब तक
हक़ीक़त में भी तुझ से आश्नाई चाहते हैं हम
- माहम ख़ान
हुस्न-ए-दिलकश इसे कहते हैं कि हम सारी उम्र
उन को देखा किए दीदार की हसरत न गई
- जलील मानिकपुरी
कभी तो आसमाँ से चाँद उतरे जाम हो जाए
तुम्हारे नाम की इक ख़ूब-सूरत शाम हो जाए
- बशीर बद्र
शामें किसी को माँगती हैं आज भी 'फ़िराक़'
गो ज़िंदगी में यूँ मुझे कोई कमी नहीं
- फ़िराक़ गोरखपुरी
हम दुनिया से जब तंग आया करते हैं
अपने साथ इक शाम मनाया करते हैं
- तैमूर हसन
दुनिया के सितम याद न अपनी ही वफ़ा याद
अब मुझ को नहीं कुछ भी मोहब्बत के सिवा याद
- जिगर मुरादाबादी
Urdu Poetry: ये तिरी सादा-दिली मार न डाले मुझ को