अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
हम परिंदों से हुनर छीनेगा कौन
जल गया इक घर तो सौ घर बन गए
- ज़ीनतउल्लाह जावेद
शजर महफ़ूज़ आँगन का रखो तुम
परिंदे चहचहाना चाहते हैं
- अवनीश त्रिवेदी अभय
बस सुनाते हो फ़ैसला अपना
तुम कभी मशवरा नहीं करते
- शाहरुख़ अबीर
ऐ दिल-ए-बे-क़रार चुप हो जा
जा चुकी है बहार चुप हो जा
- साग़र सिद्दीक़ी
दूर तक फैला हुआ पानी ही पानी हर तरफ़
अब के बादल ने बहुत की मेहरबानी हर तरफ़
- शबाब ललित
तुम इन्हें बारिशें समझते हो
हम ने रोने का तज्रबा किया है
- नदीम भाभा
Urdu Poetry: चलो कि लौट के हम अपने अपने घर जाएँ