अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
हम को न मिल सका तो फ़क़त इक सुकून-ए-दिल
ऐ ज़िंदगी वगर्ना ज़माने में क्या न था
- आज़ाद अंसारी
जुस्तुजू करनी हर इक अम्र में नादानी है
जो कि पेशानी पे लिक्खी है वो पेश आनी है
- इमाम बख़्श नासिख़
तुम्हें पता है मिरे हाथ की लकीरों में
तुम्हारे नाम के सारे हुरूफ़ बनते हैं
- फ़रीहा नक़वी
ज़िंदगी ख़्वाब देखती है मगर
ज़िंदगी ज़िंदगी है ख़्वाब नहीं
- शबनम रूमानी
खिल रहे हैं गुलाब ज़ख़्मों के
शुक्रिया आप की नवाज़िश का
- एजाज़ रहमानी
मिरे ख़ुदा मुझे इतना तो मो'तबर कर दे
मैं जिस मकान में रहता हूँ उस को घर कर दे
- इफ़्तिख़ार आरिफ़
Urdu Poetry: याद आते हो तुम ख़ुद ही हम याद नहीं करते