अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
सच है एहसान का भी बोझ बहुत होता है
चार फूलों से दबी जाती है तुर्बत मेरी
- जलील मानिकपुरी
एहसान-ए-रब मोहब्बतें इतनी मिलीं 'अदील'
इस उम्र-ए-मुख़्तसर में न लौटा सकेंगे हम
- अदील ज़ैदी
दरिया के तलातुम से तो बच सकती है कश्ती
कश्ती में तलातुम हो तो साहिल न मिलेगा
- मलिकज़ादा मंज़ूर अहमद
कभी मैं अपने हाथों की लकीरों से नहीं उलझा
मुझे मालूम है क़िस्मत का लिक्खा भी बदलता है
- बशीर बद्र
उस से ही तो चलते हैं कारोबार गुलशन के
वो ही रात-रानी है वो ही गुल-हज़ारा है
- प्रवीन राय
इस तरफ़ से गुज़रे थे क़ाफ़िले बहारों के
आज तक सुलगते हैं ज़ख़्म रहगुज़ारों के
- साहिर लुधियानवी
Urdu Poetry: तुम ने सिर्फ़ चाहा है हम ने छू के देखे हैं