Urdu Poetry: जो पूरे होने से रह गए थे वो ख़्वाब रक्खे हुए हैं घर में

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली 

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जो पूरे होने से रह गए थे वो ख़्वाब रक्खे हुए हैं घर में
यक़ीन मानो पुरानी रुत के गुलाब रक्खे हुए हैं घर में
- मोहम्मद मुबशशिर मेयो

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आई होगी किसी को हिज्र में मौत
मुझ को तो नींद भी नहीं आती
- अकबर इलाहाबादी

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गुज़र तो जाएगी तेरे बग़ैर भी लेकिन
बहुत उदास बहुत बे-क़रार गुज़रेगी
- अज्ञात

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बिछड़ गए तो ये दिल उम्र भर लगेगा नहीं
लगेगा लगने लगा है मगर लगेगा नहीं
- उमैर नजमी

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आग़ाज़-ए-मोहब्बत का अंजाम बस इतना है
जब दिल में तमन्ना थी अब दिल ही तमन्ना है
- जिगर मुरादाबादी

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कितने दिनों के प्यासे होंगे यारो सोचो तो
शबनम का क़तरा भी जिन को दरिया लगता है
- क़ैसर-उल जाफ़री

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Urdu Poetry: अंधेरों को निकाला जा रहा है

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