Urdu Poetry: जंगल जंगल आग लगी है दरिया दरिया पानी है

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली 

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जंगल जंगल आग लगी है दरिया दरिया पानी है
नगरी नगरी थाह नहीं है लोग बहुत घबराए हैं
- जमील अज़ीमाबादी  

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आज भी शायद कोई फूलों का तोहफ़ा भेज दे
तितलियाँ मंडला रही हैं काँच के गुल-दान पर
- शकेब जलाली

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मैं अब किसी की भी उम्मीद तोड़ सकता हूँ
मुझे किसी पे भी अब कोई ए'तिबार नहीं
- जव्वाद शैख़

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दूर तक छाए थे बादल और कहीं साया न था
इस तरह बरसात का मौसम कभी आया न था
- क़तील शिफ़ाई

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हम एक शहर में थे इक नदी की दूरी पर
और उस नदी में कोई और वक़्त बहता था
- एहतिशाम अली

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सफ़र में ऐसे कई मरहले भी आते हैं
हर एक मोड़ पे कुछ लोग छूट जाते हैं
- आबिद अदीब

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Urdu Poetry: सुनते थे वो आएँगे सुनते थे सहर होगी

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