Urdu Poetry: रोते रोते भी तिरे नाम पे हँस देता हूँ

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली 

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क़िस्सा-ए-दर्द को करते हुए ज़ब्त-ए-तहरीर
रोते रोते भी तिरे नाम पे हँस देता हूँ
- बर्क़ आशियान्वी 

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आशिक़ी से मिलेगा ऐ ज़ाहिद
बंदगी से ख़ुदा नहीं मिलता
- दाग़ देहलवी

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हम परिंदों से हुनर छीनेगा कौन
जल गया इक घर तो सौ घर बन गए
- ज़ीनतउल्लाह जावेद  

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हज़रत-ए-दाग़ जहाँ बैठ गए बैठ गए
और होंगे तिरी महफ़िल से उभरने वाले
- दाग़ देहलवी   

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Urdu Poetry: सारी दुनिया के ग़म हमारे हैं, और सितम ये कि हम तुम्हारे हैं

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