अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
आदमी का आदमी हर हाल में हमदर्द हो
इक तवज्जोह चाहिए इंसाँ को इंसाँ की तरफ़
- हफ़ीज़ जौनपुरी
दूर ख़ामोश बैठा रहता हूँ
इस तरह हाल दिल का कहता हूँ
- आबरू शाह मुबारक
निकाले गए इस के मअ'नी हज़ार
अजब चीज़ थी इक मिरी ख़ामुशी
- ख़लील-उर-रहमान आज़मी
चुप चुप मकान रास्ते गुम-सुम निढाल वक़्त
इस शहर के लिए कोई दीवाना चाहिए
- निदा फ़ाज़ली
हज़ार तरह के थे रंज पिछले मौसम में
पर इतना था कि कोई साथ रोने वाला था
- जमाल एहसानी
दिल दबा जाता है कितना आज ग़म के बार से
कैसी तन्हाई टपकती है दर ओ दीवार से
- अकबर हैदराबादी
Urdu Poetry: मुद्दत के ब'अद आज मैं ऑफ़िस नहीं गया