अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
मिरी तरफ़ से तो टूटा नहीं कोई रिश्ता
किसी ने तोड़ दिया ए'तिबार टूट गया
- अख़्तर नज़्मी
मुझे है ए'तिबार-ए-वादा लेकिन
तुम्हें ख़ुद ए'तिबार आए न आए
- अख़्तर शीरानी
या तेरे अलावा भी किसी शय की तलब है
या अपनी मोहब्बत पे भरोसा नहीं हम को
- शहरयार
दर्द-ए-दिल क्या बयाँ करूँ 'रश्की'
उस को कब ए'तिबार आता है
- मोहम्मद अली ख़ाँ रश्की
आ गए हैं 'अबीर' कूचे में
पहली बरसात और हम दोनों
- शाहरुख़ अबीर
अब भी बरसात की रातों में बदन टूटता है
जाग उठती हैं अजब ख़्वाहिशें अंगड़ाई की
- परवीन शाकिर
Urdu Poetry: ख़ुद से मिलना मिरा इक शख़्स के खोने से हुआ