अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
सूरज हूँ ज़िंदगी की रमक़ छोड़ जाऊँगा
मैं डूब भी गया तो शफ़क़ छोड़ जाऊँगा
- इक़बाल साजिद
क्या कहें कितने मरासिम थे हमारे उस से
वो जो इक शख़्स है मुँह फेर के जाने वाला
- अहमद फ़राज़
जग में आ कर इधर उधर देखा
तू ही आया नज़र जिधर देखा
- ख़्वाजा मीर दर्द
उन्हीं से ताज़गी-ए-ज़ेहन है नसीब मुझे
गुलाब चेहरे हमेशा नज़र में रहते हैं
- अब्दुस्समद ख़तीब
ज़िंदगी एक फ़न है लम्हों को
अपने अंदाज़ से गँवाने का
- जौन एलिया
मुझे तन्हाई की आदत है मेरी बात छोड़ें
ये लीजे आप का घर आ गया है हाथ छोड़ें
- जावेद सबा
Urdu Poetry: भीड़ तन्हाइयों का मेला है, आदमी आदमी अकेला है