Urdu Poetry: मैं किसी और समुंदर में उतर जाऊँगा

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली  

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ऐ फ़ना टूट सकेगी न कभी कश्ती-ए-उम्र
मैं किसी और समुंदर में उतर जाऊँगा
- असर सहबाई  

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घर की वहशत से लरज़ता हूँ मगर जाने क्यूँ
शाम होती है तो घर जाने को जी चाहता है
- इफ़्तिख़ार आरिफ़ 

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फूल गुल शम्स ओ क़मर सारे ही थे
पर हमें उन में तुम्हीं भाए बहुत
- मीर तक़ी मीर  

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इक सफ़ीना है तिरी याद अगर
इक समुंदर है मिरी तन्हाई
- अहमद नदीम क़ासमी

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Urdu Poetry: मैं ज़िंदगी का साथ निभाता चला गया

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