अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
हम फ़क़ीरों का पैरहन है धूप
और ये रात अपनी चादर है
- आबिद वदूद
मैं अकेला ही चला था जानिब-ए-मंज़िल मगर
लोग साथ आते गए और कारवाँ बनता गया
- मजरूह सुल्तानपुरी
फूलों को सुर्ख़ी देने में
पत्ते पीले हो जाते हैं
- फ़हमी बदायूंनी
कुछ फूलों की ख़ातिर भी कुछ फूलों का
सब से अच्छा रंग चुराना पड़ता है
- नदीम भाभा
गुल-दान में सजा के हैं हम लोग कितने ख़ुश
वो शाख़ एक फूल भी जिस पर नया न हो
- राज नारायण राज़
तुम्हारे शहर का मौसम बड़ा सुहाना लगे
मैं एक शाम चुरा लूँ अगर बुरा न लगे
- क़ैसर-उल जाफ़री
Urdu Poetry: तमाम रात नहाया था शहर बारिश में