अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
हम को न मिल सका तो फ़क़त इक सुकून-ए-दिल
ऐ ज़िंदगी वगर्ना ज़माने में क्या न था
- आज़ाद अंसारी
कोई मंज़िल के क़रीब आ के भटक जाता है
कोई मंज़िल पे पहुँचता है भटक जाने से
- क़सरी कानपुरी
सुना है अब भी मिरे हाथ की लकीरों में
नजूमियों को मुक़द्दर दिखाई देता है
- अमीर क़ज़लबाश
अपनी क़िस्मत में सभी कुछ था मगर फूल न थे
तुम अगर फूल न होते तो हमारे होते
- अशफ़ाक़ नासिर
अपने माथे की शिकन तुम से मिटाई न गई
अपनी तक़दीर के बल हम से निकाले न गए
- जलील मानिकपुरी
ख़ुदा ऐसे एहसास का नाम है
रहे सामने और दिखाई न दे
- बशीर बद्र
Urdu Poetry: ख़्वाहिशों ने डुबो दिया दिल को