Urdu Poetry: मुझ को ख़्वाहिश ही ढूंढ़ने की न थी

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली 

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मुझ को ख़्वाहिश ही ढूँडने की न थी
मुझ में खोया रहा ख़ुदा मेरा
- जौन एलिया

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जग में आ कर इधर उधर देखा
तू ही आया नज़र जिधर देखा
- ख़्वाजा मीर दर्द

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मेरी क़िस्मत में ग़म गर इतना था
दिल भी या-रब कई दिए होते
- मिर्ज़ा ग़ालिब

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हमारी राह से पत्थर उठा कर फेंक मत देना
लगी हैं ठोकरें तब जा के चलना सीख पाए हैं
- नफ़स अम्बालवी

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रूप की धूप कहाँ जाती है मालूम नहीं
शाम किस तरह उतर आती है रुख़्सारों पर
- इरफ़ान सिद्दीक़ी

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मोहब्बत की तो कोई हद, कोई सरहद नहीं होती
हमारे दरमियाँ ये फ़ासले, कैसे निकल आए
- ख़ालिद मोईन

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Urdu Poetry: किताबें भी बिल्कुल मेरी तरह हैं

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