Urdu Poetry: कौन कहे मा'सूम हमारा बचपन था

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली 

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कौन कहे मा'सूम हमारा बचपन था
खेल में भी तो आधा आधा आँगन था
- शारिक़ कैफ़ी 

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धूप मुसाफ़िर छाँव मुसाफ़िर आए कोई कोई जाए
घर में बैठा सोच रहा हूँ आँगन है या रस्ता है
- रईस फ़रोग़

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ये न थी हमारी क़िस्मत कि विसाल-ए-यार होता
अगर और जीते रहते यही इंतिज़ार होता
- मिर्ज़ा ग़ालिब

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रोज़ वो ख़्वाब में आते हैं गले मिलने को
मैं जो सोता हूँ तो जाग उठती है क़िस्मत मेरी
- जलील मानिकपुरी 

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कुछ वो जिन्हें हम से निस्बत थी उन कूचों में आन आबाद हुए
कुछ अर्श पे तारे कहलाए कुछ फूल बने जा गुलशन में
- इब्न-ए-इंशा

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एक महफ़िल में कई महफ़िलें होती हैं शरीक
जिस को भी पास से देखोगे अकेला होगा
- निदा फ़ाज़ली

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Urdu Poetry: नीली आँखों पे घनी पलकों को डाले रखना

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