Urdu Poetry: इक तिरा ज़िक्र था और बीच में क्या क्या निकला

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली 

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आरज़ू हसरत और उम्मीद शिकायत आँसू
इक तिरा ज़िक्र था और बीच में क्या क्या निकला
- सरवर आलम राज़

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इस क़दर रोया हूँ तेरी याद में
आईने आँखों के धुँदले हो गए
- नासिर काज़मी

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खड़ा हूँ आज भी रोटी के चार हर्फ़ लिए
सवाल ये है किताबों ने क्या दिया मुझ को
- नज़ीर बाक़री

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रात को सोना न सोना सब बराबर हो गया
तुम न आए ख़्वाब में आँखों में ख़्वाब आया तो क्या
- जलील मानिकपुरी 

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हम परिंदों से हुनर छीनेगा कौन
जल गया इक घर तो सौ घर बन गए
- ज़ीनतउल्लाह जावेद

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तन्हाई में करनी तो है इक बात किसी से
लेकिन वो किसी वक़्त अकेला नहीं होता
- अहमद मुश्ताक़

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Urdu Poetry: जो कुछ मुझे दिया है वो लौटा रहा हूँ मैं

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