अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
सच है एहसान का भी बोझ बहुत होता है
चार फूलों से दबी जाती है तुर्बत मेरी
- जलील मानिकपुरी
नज़र मिली भी न थी और उन को देख लिया
ज़बाँ खुली भी न थी और बात भी कर ली
- कैफ़ी आज़मी
चुप चुप मकान रास्ते गुम-सुम निढाल वक़्त
इस शहर के लिए कोई दीवाना चाहिए
- निदा फ़ाज़ली
घूरने से क्या तुम्हारी आँखों के हम डर गए
वे अगर हैं मस्त ऐ प्यारे तो दीवाने हैं हम
- रज़ा अज़ीमाबादी
तिनकों से खेलते ही रहे आशियाँ में हम
आया भी और गया भी ज़माना बहार का
- फ़ानी बदायूंनी
कौन है इस रिम-झिम के पीछे छुपा हुआ
ये आँसू सारे के सारे किस के हैं
- जमाल एहसानी
Urdu Poetry: क्या हसीं ख़्वाब मोहब्बत ने दिखाया था हमें