अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
मुद्दत के ब'अद आज मैं ऑफ़िस नहीं गया
ख़ुद अपने साथ बैठ के दिन भर शराब पी
- फ़ाज़िल जमीली
दोस्ती जब किसी से की जाए
दुश्मनों की भी राय ली जाए
- राहत इंदौरी
न उदास हो न मलाल कर किसी बात का न ख़याल कर
कई साल ब'अद मिले हैं हम तेरे नाम आज की शाम है
- बशीर बद्र
पुराने यार भी आपस में अब नहीं मिलते
न जाने कौन कहाँ दिल लगा के बैठ गया
- फ़ाज़िल जमीली
दिल से निकल कर देखो तो
क्या आलम है बाहर का
- बाक़ी सिद्दीक़ी
मैं अब किसी की भी उम्मीद तोड़ सकता हूँ
मुझे किसी पे भी अब कोई ए'तिबार नहीं
- जव्वाद शैख़
Urdu Poetry: फिर से ख़ुदा बनाएगा कोई नया जहाँ