अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
ख़्वाहिशों ने डुबो दिया दिल को
वर्ना ये बहर-ए-बे-कराँ होता
- इस्माइल मेरठी
दिल ने तमन्ना की थी जिस की बरसों तक
ऐसे ज़ख़्म को अच्छा कर के बैठ गए
- ग़ुलाम मुर्तज़ा राही
न इब्तिदा की ख़बर है न इंतिहा मालूम
रहा ये वहम कि हम हैं सो वो भी क्या मालूम
- फ़ानी बदायूंनी
लम्हों के अज़ाब सह रहा हूँ
मैं अपने वजूद की सज़ा हूँ
- अतहर नफ़ीस
आज फिर टूटेंगी तेरे घर की नाज़ुक खिड़कियाँ
आज फिर देखा गया दीवाना तेरे शहर में
- कैफ़ी आज़मी
लम्हे उदास उदास फ़ज़ाएँ घुटी घुटी
दुनिया अगर यही है तो दुनिया से बच के चल
- शकील बदायूंनी
Urdu Poetry: देंगे वही जो पाएँगे इस ज़िंदगी से हम