अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
अँधेरे छू नहीं सकते हैं मुझ को
कि मेरे साथ तेरी रौशनी है
- शारिब लखनवी
जब आ जाती है दुनिया घूम फिर कर अपने मरकज़ पर
तो वापस लौट कर गुज़रे ज़माने क्यूँ नहीं आते
- इबरत मछलीशहरी
और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा
राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा
- फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
उन्हें ठहरे समुंदर ने डुबोया
जिन्हें तूफ़ाँ का अंदाज़ा बहुत था
- मलिकज़ादा मंज़ूर अहमद
दिल से आती है बात लब पे 'हफ़ीज़'
बात दिल में कहाँ से आती है
- हफ़ीज़ होशियारपुरी
तुम अभी शहर में क्या नए आए हो
रुक गए राह में हादसा देख कर
- बशीर बद्र
Urdu Poetry: उस की भी मिरी तरह थी इक अपनी कहानी