Urdu Poetry: तेरी सूरत से किसी की नहीं मिलती सूरत

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली 

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तेरी सूरत से किसी की नहीं मिलती सूरत
हम जहाँ में तिरी तस्वीर लिए फिरते हैं
- इमाम बख़्श नासिख़  

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वो कोई दोस्त था अच्छे दिनों का
जो पिछली रात से याद आ रहा है
- नासिर काज़मी

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सुबूत है ये मोहब्बत की सादा-लौही का
जब उस ने वादा किया हम ने ए'तिबार किया
- जोश मलीहाबादी

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दिल है कि तिरी याद से ख़ाली नहीं रहता
शायद ही कभी मैं ने तुझे याद किया हो
- ज़ेब ग़ौरी

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तुम फिर उसी अदा से अंगड़ाई ले के हँस दो
आ जाएगा पलट कर गुज़रा हुआ ज़माना
शकील बदायूंनी 

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देखूँ तिरे हाथों को तो लगता है तिरे हाथ
मंदिर में फ़क़त दीप जलाने के लिए हैं
- जाँ निसार अख़्तर

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Urdu Poetry: आवाज़ दे के देख लो शायद वो मिल ही जाए

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