Urdu Poetry: इंसाँ की ख़्वाहिशों की कोई इंतिहा नहीं

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली 

Image Credit :

इंसाँ की ख़्वाहिशों की कोई इंतिहा नहीं
दो गज़ ज़मीं भी चाहिए दो गज़ कफ़न के बाद
- कैफ़ी आज़मी 

Image Credit :

कोई भी घर में समझता न था मिरे दुख सुख
एक अजनबी की तरह मैं ख़ुद अपने घर में था
- राजेन्द्र मनचंदा बानी  

Image Credit :

धोका है इक फ़रेब है मंज़िल का हर ख़याल
सच पूछिए तो सारा सफ़र वापसी का है
- राजेश रेड्डी

Image Credit :

सारा दिन तपते सूरज की गर्मी में जलते रहे
ठंडी ठंडी हवा फिर चली सो रहो सो रहो
- नासिर काज़मी  

Image Credit :

तारीकियों ने ख़ुद को मिलाया है धूप में
साया जो शाम का नज़र आया है धूप में
- ताहिर फ़राज़  

Image Credit :

शह-ज़ोर अपने ज़ोर में गिरता है मिस्ल-ए-बर्क़
वो तिफ़्ल क्या गिरेगा जो घुटनों के बल चले
- मिर्ज़ा अज़ीम बेग 'अज़ीम'  

Image Credit :

Urdu Poetry: दिल को कई कहानियाँ याद सी आ के रह गईं

Read Now