Urdu Poetry: एक तख़्ती अम्न के पैग़ाम की टाँग दीजे ऊँचे मीनारों के बीच

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली 

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एक तख़्ती अम्न के पैग़ाम की
टाँग दीजे ऊँचे मीनारों के बीच
- अज़ीज़ नबील 

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मुद्दत के बा'द उस ने जो की लुत्फ़ की निगाह
जी ख़ुश तो हो गया मगर आँसू निकल पड़े
- कैफ़ी आज़मी

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मिरी ज़बान के मौसम बदलते रहते हैं
मैं आदमी हूँ मिरा ए'तिबार मत करना
- आसिम वास्ती 

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हम लोगों को पानी अच्छा लगता है
हम लोगों ने मिट्टी पहनी हुई है दोस्त
- नईम सरमद 

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Urdu Poetry: नींदों में फिर रहा हूँ उसे ढूँढ़ता हुआ

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