अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
वहाँ हमारा कोई मुंतज़िर नहीं फिर भी
हमें न रोक कि घर जाना चाहते हैं हम
- वाली आसी
गँवाई किस की तमन्ना में ज़िंदगी मैं ने
वो कौन है जिसे देखा नहीं कभी मैं ने
- जौन एलिया
जी ढूँढ़ता है फिर वही फ़ुर्सत कि रात दिन
बैठे रहें तसव्वुर-ए-जानाँ किए हुए
- मिर्ज़ा ग़ालिब
तुम से बिछड़ कर ज़िंदा हैं
जान बहुत शर्मिंदा हैं
- इफ़्तिख़ार आरिफ़
Urdu Poetry: पूरी होती हैं तसव्वुर में उमीदें क्या क्या