अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
पलट न जाएँ हमेशा को तेरे आँगन से
गुदाज़ लम्हों की बे-ख़्वाब आहटों से न रूठ
- इरफ़ान सिद्दीक़ी
तेरे आने की क्या उमीद मगर
कैसे कह दूँ कि इंतिज़ार नहीं
- फ़िराक़ गोरखपुरी
चुपके चुपके रात दिन आँसू बहाना याद है
हम को अब तक आशिक़ी का वो ज़माना याद है
- हसरत मोहानी
फ़रिश्ते से बढ़ कर है इंसान बनना
मगर इस में लगती है मेहनत ज़ियादा
- अल्ताफ़ हुसैन हाली
चमक रहा है ख़ेमा-ए-रौशन दूर सितारे सा
दिल की कश्ती तैर रही है खुले समुंदर में
- ज़ेब ग़ौरी
इस तरह ज़िंदगी ने दिया है हमारा साथ
जैसे कोई निबाह रहा हो रक़ीब से
- साहिर लुधियानवी
इस बार देख ऐसा भी मुमकिन है मेरे दोस्त
मैं अपना भूल जाऊँ पता तेरे शहर में
- सोनिया सोनम अक्स
Urdu Poetry: तमाम उम्र ख़ुशी की तलाश में गुज़री