अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
नींदों में फिर रहा हूँ उसे ढूँढ़ता हुआ
शामिल जो एक ख़्वाब मिरे रत-जगे में था
- अहमद मुश्ताक़
इक ख़्वाब ही तो था जो फ़रामोश हो गया
इक याद ही तो थी जो भुला दी गई तो क्या
- इफ़्तिख़ार आरिफ़
ये इल्तिजा दुआ ये तमन्ना फ़ुज़ूल है
सूखी नदी के पास समुंदर न जाएगा
- हयात लखनवी
सुर्ख़-रू होता है इंसाँ ठोकरें खाने के बा'द
रंग लाती है हिना पत्थर पे पिस जाने के बा'द
- सय्यद ग़ुलाम मोहम्मद मस्त कलकत्तवी
Urdu Poetry: हम डूब के समझे हैं दरिया तिरी गहराई