अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
कभी जो ख़्वाब था वो पा लिया है
मगर जो खो गई वो चीज़ क्या थी
- जावेद अख़्तर
न इब्तिदा की ख़बर है न इंतिहा मालूम
रहा ये वहम कि हम हैं सो वो भी क्या मालूम
- फ़ानी बदायूंनी
थी वस्ल में भी फ़िक्र-ए-जुदाई तमाम शब
वो आए तो भी नींद न आई तमाम शब
- मोमिन ख़ाँ मोमिन
या तेरे अलावा भी किसी शय की तलब है
या अपनी मोहब्बत पे भरोसा नहीं हम को
- शहरयार
Urdu Poetry: वक़्त की गर्दिशों का ग़म न करो हौसले मुश्किलों में पलते हैं