अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
हम ने घर की सलामती के लिए
ख़ुद को घर से निकाल रक्खा है
- अज़हर अदीब
दर्द-ए-हिजरत के सताए हुए लोगों को कहीं
साया-ए-दर भी नज़र आए तो घर लगता है
- बख़्श लाइलपुरी
उन दिनों घर से अजब रिश्ता था
सारे दरवाज़े गले लगते थे
- मोहम्मद अल्वी
जो पूरे होने से रह गए थे वो ख़्वाब रक्खे हुए हैं घर में
यक़ीन मानो पुरानी रुत के गुलाब रक्खे हुए हैं घर में
- मोहम्मद मुबशशिर मेयो
दरवाज़े को बंद न रखना
घर में जाला पड़ जाता है
- इक़बाल असलम
नींद मिट्टी की महक सब्ज़े की ठंडक
मुझ को अपना घर बहुत याद आ रहा है
- अब्दुल अहद साज़
Urdu Poetry: मिरी तरफ़ से तो टूटा नहीं कोई रिश्ता