अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
हम को न मिल सका तो फ़क़त इक सुकून-ए-दिल
ऐ ज़िंदगी वगर्ना ज़माने में क्या न था
- आज़ाद अंसारी
खो दिया तुम को तो हम पूछते फिरते हैं यही
जिस की तक़दीर बिगड़ जाए वो करता क्या है
- फ़िराक़ गोरखपुरी
कब हँसा था जो ये कहते हो कि रोना होगा
हो रहेगा मिरी क़िस्मत में जो होना होगा
- अज्ञात
मुझ को ख़्वाहिश ही ढूँढ़ने की न थी
मुझ में खोया रहा ख़ुदा मेरा
- जौन एलिया
या-रब तिरी रहमत से मायूस नहीं 'फ़ानी'
लेकिन तिरी रहमत की ताख़ीर को क्या कहिए
- फ़ानी बदायूंनी
झोलियाँ सब की भरती जाती हैं
देने वाला नज़र नहीं आता
- अमजद हैदराबादी
Urdu Poetry: मुझे मालूम है क़िस्मत का लिक्खा भी बदलता है