अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
उन के होने से बख़्त होते हैं
बाप घर के दरख़्त होते हैं
- अज्ञात
हमें पढ़ाओ न रिश्तों की कोई और किताब
पढ़ी है बाप के चेहरे की झुर्रियाँ हम ने
- मेराज फ़ैज़ाबादी
मुझ को छाँव में रखा और ख़ुद भी वो जलता रहा
मैं ने देखा इक फ़रिश्ता बाप की परछाईं में
- अज्ञात
बच्चे मेरी उँगली थामे धीरे धीरे चलते थे
फिर वो आगे दौड़ गए मैं तन्हा पीछे छूट गया
- ख़ालिद महमूद
Urdu Poetry: करूँगा क्या जो मोहब्बत में हो गया नाकाम