अमर उजाला
Mon, 16 June 2025
वक़्त से लम्हा लम्हा खेली है
ज़िंदगी इक अजब पहेली है
~ अमीता परसुराम मीता
कुछ तो है बात जो आती है क़ज़ा रुक रुक के
ज़िंदगी क़र्ज़ है क़िस्तों में अदा होती है
~ क़मर जलालाबादी
बहुत अज़ीज़ थी ये ज़िंदगी मगर हम लोग
कभी कभी तो किसी आरज़ू में मर भी गए
~ अब्बास रिज़वी
इक इक क़दम पे रक्खी है यूँ ज़िंदगी की लाज
ग़म का भी एहतिराम किया है ख़ुशी के साथ
~ कैफ़ी बिलग्रामी
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