अमर उजाला काव्य डेस्क
बेहतर तो है यही कि न दुनिया से दिल लगे
पर क्या करें जो काम न बे-दिल-लगी चले
- शेख़ इब्राहीम ज़ौक़
ये मज़ा था दिल-लगी का कि बराबर आग लगती
न तुझे क़रार होता न मुझे क़रार होता
- दाग़ देहलवी
दिल-लगी कीजिए रक़ीबों से
इस तरह का मिरा मिज़ाज नहीं
- दाग़ देहलवी
सोच लो ये दिल-लगी भारी न पड़ जाए कहीं
जान जिस को कह रहे हो जान होती जाएगी
- अमीर इमाम
तुम्हें दिल-लगी भूल जानी पड़ेगी मोहब्बत की राहों में आ कर तो देखो
तड़पने पे मेरे न फिर तुम हँसोगे कभी दिल किसी से लगा कर तो देखो
- पुरनम इलाहाबादी
Urdu Poetry: सूरज के बिंब लिए चुनिंदा शेर