जो दूसरे की पत्नी को अपनी माता मानता है, दूसरे के धन को मिट्टी का ढेला, दूसरे के सुख दुःख को अपने सुख दुःख. उसी को सही दृष्टि प्राप्त है और वही विद्वान है.
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जिस व्यक्ति ने आपको अध्यात्मिक महत्ता का एक अक्षर भी पढ़ाया उसकी पूजा करनी चाहिए. जो ऐसे गुरु का सम्मान नहीं करता वह सौ बार कुत्ते का जन्म लेता है और आखिर चंडाल बनता है. चांडाल वह है जो कुत्ता खाता है.
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हमें अपने कर्म का फल मिलता है. हमारी बुद्धि पर इसके पहले हमने जो कर्म किए हैं उसका निशान है. इसीलिए जो बुद्धिमान लोग हैं वो सोच-विचार कर कर्म करते हैं.
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यदि आदमी एक पल के लिए भी जिए तो भी उस पल को वह शुभ कर्म करने में खर्च करे. एक कल्प तक जी कर कोई लाभ नहीं. दोनों लोक इस लोक और पर-लोक में तकलीफ होती है.
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यह देवताओ का, संतजनों का और पालकों का स्वभाव है कि वो जल्दी प्रसन्न हो जाते हैं. निकट के और दूर के रिश्तेदार तब प्रसन्न होते हैं जब उनका आदर सम्मान किया जाए. उनके नहाने का, खाने पीने का प्रबंध किया जाए. पंडित जन जब उन्हें अध्यात्मिक सन्देश का मौका दिया जाता है तो प्रसन्न होते हैं.
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इस धरती पर अन्न, जल और मीठे वचन ये असली रत्न है. मूर्खों को लगता है पत्थर के टुकड़े रत्न हैं...