Hindi News ›   World ›   About 90 percent of US households will receive cash assistance of $ 1,400 under the Corona relief package

कोरोना राहत पैकेज: अमेरिका में डेमोक्रेटिक पार्टी पर प्रोग्रेसिव धड़े का बढ़ रहा है असर, 90 फीसदी परिवारों को मिलेगी प्रतिमाह 1,400 डॉलर की मदद

वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, वाशिंगटन Published by: Harendra Chaudhary Updated Thu, 11 Mar 2021 03:28 PM IST

सार

इस पैकेज के तहत अमेरिका के लगभग 90 फीसदी परिवारों को 1,400 डॉलर की नकदी सहायता मिलेगी। बेरोजगारों को हर हफ्ते 300 डॉलर का भत्ता दिया जाएगा। हर बच्चे को 3,600 डॉलर की सहायता दी जाएगी...
जो बाइडन (फाइल फोटो)
जो बाइडन (फाइल फोटो) - फोटो : PTI
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विस्तार

अमेरिकी कांग्रेस (संसद) में पास हुए 1.9 खरब डॉलर के कोरोना राहत पैकेज को डेमोक्रेटिक पार्टी के प्रोग्रेसिव धड़े की बड़ी जीत माना जा रहा है। वेबसाइट पोलिटिको.कॉम ने इस बारे में एक टिप्पणी में कहा है कि ऐसा लगता है कि इस पैकेज पर राष्ट्रपति जो बाइडन का नहीं, बल्कि सोशलिस्ट नेता बर्नी सैंडर्स के हस्ताक्षर हैं। सैंडर्स अभी सीनेट की बजट समिति के अध्यक्ष हैं। उन्होंने रिपब्लिकन पार्टी के जोरदार विरोध के बावजूद इस पैकेज से संबंधित बिल को पारित कराने में एड़ी-चोटी का जोर लगाया। बिल को मंजूरी मिलने के बाद उन्होंने एक वीडियो जारी कर इस पैकेज के पास होने का श्रेय पार्टी के प्रोग्रेसिव धड़े को दिया।



इस पैकेज को अमेरिका में हाल के दशकों में उठाया गया जन कल्याण का सबसे बड़ा कदम बताया जा रहा है। इस पैकेज के तहत अमेरिका के लगभग 90 फीसदी परिवारों को 1,400 डॉलर की नकदी सहायता मिलेगी। बेरोजगारों को हर हफ्ते 300 डॉलर का भत्ता दिया जाएगा। हर बच्चे को 3,600 डॉलर की सहायता दी जाएगी। राज्यों और स्थानीय प्रशासन को सहायता कार्यक्रमों के लिए 350 डॉलर दिए जाएंगे। महामारी के कारण बंद हुए स्कूलों में बच्चे फिर लौट सकें, इसकी व्यवस्था करने के लिए भी एक बड़ी रकम का प्रावधान किया गया है। मुफ्त भोजन योजना को अगले सितंबर तक बढ़ा दिया गया है। इसके लिए इस योजना के बजट में 15 फीसदी की बढ़ोतरी की गई है। पैकेज के तहत कम आमदनी वाले घरों को किराया चुकाने में मदद देने के लिए रकम दी जाएगी। ग्रामीण इलाकों के अस्पतालों और वहां के हेल्थ केयर प्रोवाइडर्स के लिए 8.5 अरब की अतिरिक्त रकम का प्रावधान किया गया है।


हालांकि पैकेज को लेकर सबसे ज्यादा चर्चा 1,400 डॉलर की नकदी सहायता की रही है, लेकिन इसके तहत बच्चों के लिए किए गए प्रावधान और हेल्थ केयर सेक्टर के लिए दी गई रकम को भी बहुत अहम माना गया है। कुछ जानकारों ने ध्यान दिलाया है कि बच्चों को दी जा रही सहायता एक तरह के यूनिवर्सल बेसिक इनकम योजना पर अमल है। इसी तरह बिना ज्यादा शोर के ओबामा केयर कही जाने वाली स्वास्थ्य देखभाल की योजना को इस पैकेज के जरिए काफी ताकत दी गई है। पिछले चुनाव के दौरान इन तमाम मुद्दों को प्रगतिशील धड़े ने जोर-शोर से उठाया था। उसके बाद बर्नी सैंडर्स के समर्थकों का वोट हासिल करने के लिए डेमोक्रेटिक पार्टी ने एक साझा कार्यक्रम बनाया था, उसमें इन मुद्दों को शामिल किया गया। इसीलिए अब इसे प्रोग्रेसिव्स की एक बड़ी जीत माना जा रहा है।

डेमोक्रेटिक पार्टी पर इस धड़े के बढ़ते प्रभाव की मिसाल पिछले सप्ताहांत में नेवादा राज्य में भी देखने को मिली। वहां की डेमोक्रेटिक पार्टी की शाखा पर सैंडर्स समर्थकों का कब्जा हो गया। मीडिया विश्लेषणों में ध्यान दिलाया गया है कि पांच साल पहले वहां डेमोक्रेटिक पार्टी एस्टैबलिशमेंट ने सैंडर्स समर्थकों को अपनी बात रखने का मौका नहीं दिया था। विश्लेषकों ने कहा है कि अब सैंडर्स खेमे ने उसका बदला ले लिया है। पार्टी नेतृत्व के लिए हुए पिछले सप्ताह के अंत में हुए चुनाव में सैंडर्स समर्थक गुट डेमोक्रेटिक सोशलिस्ट्स ऑफ अमेरिका की जीत हुई।

जानकारों ने कहा है कि ये ऐसी घटना है, जिसका असर नेवादा की सीमा से बाहर भी महसूस किया जाएगा। उनके मुताबिक इसका मतलब यह है कि सैंडर्स एक लंबी अवधि की रणनीति के तहत चल रहे हैं, जिसका मकसद डेमोक्रेटिक पार्टी पर पूरा नियंत्रण कायम करना है। जीत के बाद नेवादा डेमोक्रेटिक पार्टी की नई चेयरपर्सन जुडिथ ह्विटमर ने कहा- ‘इसका मतलब है कि प्रगतिशील आंदोलन मजबूत हो रहा है। अधिक से अधिक लोग इससे जुड़ रहे हैं। सबसे अलग हट कर यह कहने के बजाय कि कुछ नहीं हो सकता है, यह हो, इसे सुनिश्चित करने के लिए हम प्रतिबद्ध हैं। पूरे देश में अधिक से अधिक लोग यही महसूस कर रहे हैं।’

विश्लेषकों ने कहा है कि नेवादा की हालिया घटना का असर 2022 में मध्यावधि संसदीय चुनावों के समय पूरे देश में देखने को मिल सकता है। उन चुनावों के लिए उम्मीदवार चुनने के लिए होने वाले मतदान में एस्टैबलिशमेंट डेमोक्रेट्स के लिए प्रोग्रेसिव उम्मीदवार बड़ी चुनौती बन कर उभर सकते हैँ। ये असर 2024 के राष्ट्रपति चुनाव तक जा सकता है।

 

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