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गांधीजी के जन्मदिन पर दुष्यंत कुमार के अल्फ़ाज़...

गांधी जयंती पर दुष्यंत कुमार की कविता
                
                                                         
                            मैं फिर जनम लूँगा 
                                                                 
                            
फिर मैं 
इसी जगह आऊँगा 
उचटती निगाहों की भीड़ में 
अभावों के बीच 
लोगों की क्षत-विक्षत पीठ सहलाऊँगा 
लँगड़ाकर चलते हुए पावों को 
कंधा दूँगा 
गिरी हुई पद-मर्दित पराजित विवशता को 
बाँहों में उठाऊँगा । 

इस समूह में 

इस समूह में 
इन अनगिनत अनचीन्ही आवाजों में 
कैसा दर्द है 
कोई नहीं सुनता! 
पर इन आवाजों को 
और इन कराहों को 
दुनिया सुने मैं ये चाहूँगा । 

मेरी तो आदत है 
रोशनी जहाँ भी हो 
उसे खोज लाऊँगा 
कातरता, चुप्पी या चीखें, 
या हारे हुओं की खीज 
जहाँ भी मिलेगी 
उन्हें प्यार के सितार पर बजाऊँगा । 
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इस समूह में 

7 वर्ष पहले

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😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
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