दिल का हर दर्द खो गया जैसे
मैं तो पत्थर का हो गया जैसे
दाग़ बाक़ी नहीं कि नक़्श कहूँ
कोई दीवार धो गया जैसे
जागता ज़ेहन ग़म की धूप में था
छाँव पाते ही सो गया जैसे
देखने वाला था...और पढ़ें
'हिंदी हैं हम' शब्द शृंखला में आज का शब्द है- रेणु, जिसका अर्थ है- धूल, बालू,कण। प्रस्तुत है शिवमंगल सिंह 'सुमन' की कविता- व्याकुल वसुंधरा की काया
लौह-पदाघातों से मर्दित
हय-गज-तोप-टैंक से खौंदी
रक्तधार से...और पढ़ें
लिखना जो चाहा तुझे अल्फाजों में
मेरी जिंदगी की ये सारी किताब भर गई
किस्से लिखता गया तेरी वफ़ा के
न जाने कब ये कायनात बीत गई
गांव से शहर शहर से न जाने
कब ये देश की बात बदल गई
मैं तो था अभी नींद में गहरी
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भारत यह देश अपना
जिसका टूट गया है सपना
सीख लिया है हमने पैसों की माला जपना
रिश्ते खत्म हुए
सब रिश्तों में लगी है आग
नफरत भरी है इतनी दिलों में लगी है आग
बोलचाल सब बंद है कमरों में सब बंद है
भाई से भाई...और पढ़ें
हर नागरिक का सौंपा हुआ अहसान हूं मैं ।
बच्चों बुजुर्गों और महिलाओं का मान हूं मैं ।।
शोषित गरीबों और किसानों का आत्मसम्मान हूं मैं ।
मैं ही हिन्दू ,सिख और मुसलमान हूं मैं ।।
मैं गुरु गोविंद हु ,जीसस हूं और...और पढ़ें
धुआँ धुआँ है फ़ज़ा रौशनी बहुत कम है
सभी से प्यार करो ज़िंदगी बहुत कम है
मक़ाम जिस का फ़रिश्तों से भी ज़ियादा था
हमारी ज़ात में वो आदमी बहुत कम है
हमारे गाँव में पत्थर भी रोया करते थे
यहाँ तो फूल में...और पढ़ें
ख़ुशी तब होती है जब आपके विचार, आपके शब्द और आपके कर्म आपस में सामंजस्य में हों।
- महात्मा गांधी
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बीते हुए लम्हों को सोचा तो बहुत रोया
जब मैं तिरी बस्ती से गुज़रा तो बहुत रोया
पत्थर जिसे कहते थे सब लोग ज़माने में
कल रात न जाने क्यूँ रोया तो बहुत रोया
बचपन का ज़माना भी क्या ख़ूब ज़माना था
मिट्टी क...और पढ़ें
दुख से दूर पहुँचकर गाँधी।
सुख से मौन खड़े हो
मरते-खपते इंसानों के
इस भारत में तुम्हीं बड़े हो
जीकर जीवन को अब जीना
नहीं सुलभ है हमको
मरकर जीवन को फिर जीना
सहज सुलभ है तुमको
हमारे...और पढ़ें
ऋतुराज के स्वागत में, प्रकृति श्रृंगारित आज,
पीत वसन पीतांबरी, बसंत का शुभ आगाज़।
मलयानिल के मृदु स्पर्श से, पुलकित वन-उपवन,
नव रागों में ढल उठी, धरा-गगन की चेतन।
आम्र-मंजरी हँसती बोले, कोयल छेड़े तान,
भृंग...और पढ़ें
गंगा की गोद में जन्मी वह पावन धरती,
जहाँ ऋषियों की तपस्या ने पाई अमर कीर्ति।
कदम-कदम पर इतिहास साँसें भरता है,
वह पुण्यभूमि—बक्सर कहलाता है।
यहीं महर्षि विश्वामित्र ने तप का दीप जलाया,
यहीं राम-लक्ष्मण ने शस्त्र विद...और पढ़ें
मैं फिर जनम लूँगा
फिर मैं
इसी जगह आऊँगा
उचटती निगाहों की भीड़ में
अभावों के बीच
लोगों की क्षत-विक्षत पीठ सहलाऊँगा
लँगड़ाकर चलते हुए पावों को
कंधा दूँगा
गिरी हुई पद-मर्दित पराजित...और पढ़ें
सूखे हुए शज़र पे
बहारें नहीं आती,
दिल हो टूटा हुआ गर, तो
उसमें फिर उल्फ़त नहीं
आती...,
तन्हाई में भी उठता है
भीतर में कोई शोर..
जब रूह ही हो खाली, तो
फ़िर
जिंदगानी नहीं आती..।।।और पढ़ें
हे ज्ञानदायनी मां सरस्वती मां
मेरे मन के अज्ञानता को ज्ञान से
प्रकाशित कर दो मां
हे हंसवाहिनी मां सरस्वती मां
मेरे मन के क्लेशों को
हंसो की तरह श्वेत कर दो मां
हे वीणा वादनी मां सरस्वती मां
मेरे मन के...और पढ़ें
तुम पूछती हो मेरे दिल की ऐसी हालत क्यूॅं है!
मैं ख़ुद से पूछता हूॅं मुझे तुम से मोहब्बत क्यूॅं है!!
- आलम-ए-ग़ज़ल परवेज़ अहमद...और पढ़ें
आरा केवल एक नगर नहीं,
यह इतिहास की जीवित गाथा है,
जहाँ हर कण में स्वाभिमान बसा,
हर सांस में आज़ादी की भाषा है।
भोजपुर की इस पावन धरती ने
वीरों को जन्म दिया है,
कुँवर सिंह की तलवार ने
अंग्रेज़ी हुकूमत क...और पढ़ें
मुझसे कई बार मैं होकर गुजरी
मैंने कहा कौन हो तुम
उसने जबाव दिया तुम कौन हो
मैंने कहा फलां है मेरा नाम
उसने कहा झूठ बोल रही हो
कुछ रस्ते थे टेढ़े मेढ़े
मैं उन रस्तों होकर गुजरी
मुझसे कई...और पढ़ें
जब इन्सान ने परछाईं से कहा,
मै अकेला हूँ क्या तू है मेरे साथ।
तब परछाई ने इन्सान से कहा,
मैं नहीं तो और कौन है तेरे साथ।
हाँ, वैसे
तो मैं ही रहती हर दम तेरे साथ।
चाहे दिन हो और चाहे हो रात।
पर,
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मैंने उनको देखा
अपने घर के आँगन में।
वो जीवित है,
पर जीवंत नहीं।
ना खुलकर कभी वो हँसती है,
ना ही मैंने रोते देखा।
हर क्षण उनको
बस मैंने
औरों की फ़िक्र में
तपते देखा।
वो टूट चुकी है...और पढ़ें
गर तुम छोड़ना भी चाहो तो भी तुम्हें ना छोड़ूंगा,
तुम मुझे से प्यार करो या ना करो,
मैं तुम से प्यार करता हूं, और करता रहूंगा,
तुम मेरी तरफ देखो या ना देखो,
मैं तुम्हें ही देखता हूं, तुम्हें देखता रहूंगा,
अगर तुम छोड़...और पढ़ें