हिंदी हैं हम शब्द-शृंखला में आज का शब्द है - विधु जिसका अर्थ है 1. चंद्रमा 2. कपूर 3. ब्रह्मा। कवि अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध ने अपनी कविता में इस शब्द का प्रयोग किया है।
वर वनिता है नहीं अति कलित कुंतल वाली।
भुवन-मोहिनी-काम-क...और पढ़ें
कैसे मानूँ कि ज़माने की ख़बर रखती है
गर्दिश-ए-वक़्त तो बस मुझ पे नज़र रखती है
मेरे पैरों की थकन रूठ न जाना मुझ से
एक तू ही तो मिरा राज़-ए-सफ़र रखती है
धूप मुझ को जो लिए फिरती है साए साए
है तो...और पढ़ें
ख़िज़ाँ के ज़ख़्म हवा की महक से भरने लगे
निगार-ए-गुल के ख़द-ओ-ख़ाल फिर निखरने लगे
ये सूखे सहमे शजर देख मार्च आने पर
तेरे बदन की तरह शाख़ शाख़ भरने लगे
ग़म-ए-हयात फिर आने लगी सदा-ए-जरस
दयार-ए...और पढ़ें
सरल रेखाओं में चलती ज़रूर है
लेकिन उतनी सरल होती नहीं
इंद्रधनुष में किस सफ़ाई से देती है
अपने लचीले होने का एहसास
जबकि वहाँ भी वह सीधी रेखाओं में ही
चल रही होती है
तरंग हूँ तरंग हूँ कहती हुई
कण...और पढ़ें
मुख को ही हँसाने वाली मित्रता कोई मित्रता नहीं है। हृदय को आनंदित करने वाली मित्रता ही मित्रता है।
- तिरुवल्लुवर
हमारे यूट्यूब चैनल को Subscribe करें।
...और पढ़ें
कहा था किस ने कि अहद-ए-वफ़ा करो उस से
जो यूँ किया है तो फिर क्यूँ गिला करो उस से
नसीब फिर कोई तक़रीब-ए-क़़ुर्ब हो कि न हो
जो दिल में हों वही बातें कहा करो उस से
ये अहल-ए-बज़्म तुनुक-हौसला सही फिर भी...और पढ़ें
हिंदी की वरिष्ठ लेखिका ममता कालिया को साल 2025 का साहित्य अकादमी पुरस्कार देने की घोषणा हुई है। ममता कालिया को यह पुरस्कार उनके संस्मरण 'जीते जी इलाहाबाद' के लिए दिया गया है। साहित्य अकादमी की तरफ से जारी प्रेस विज्ञप्ति के मुताबिक अकादमी द्व...और पढ़ें
तुम से दूर जाने के लिए मजबूर कर दिया, तुम ने मुझे,
मुझे तुम्हारी गुस्से, नखरे,रुठ जाने से भी मुहब्बत है...और पढ़ें
मेरे ख्वाबों का इक सिर तुम्हारे पास है
आधा मैं बिनु तुम आधा बिन दोगे न
बड़ा नर्म ओ नाज़ुक है दिल मेरा
दिल की ख्वाहिश तुम पूरी कर दोगे न...और पढ़ें
मेरा दोस्त
मुझे से छुट रहे हैं,
शहर आएं दो हाथ, कलम व आंख ,
सब कुछ ले के....
फिर से घर को लौट जा रहे हैं ,,
कितनी कर्जदार होंगी ए शहर
तुने मौत उसके हाथों में दे दिया
ए शहर तुझे से शिकायत हैऔर पढ़ें
सुप्रसिद्ध साहित्यकार डॉ. विश्वनाथ त्रिपाठी ने अपने गुरु आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी को याद करते हुए कहा, "पंडित जी का पूरा साहित्य और आलोचना शोध पर आधारित है। वे सदैव अपने छात्रों को शोध की गहराई में उतरने के लिए प्रेरित करते थे। उनका मानना था कि...और पढ़ें
लोगों के अब पुराने व्यवहार नहीं मिलते।
तुम कहते हो त्योहारों पर हम क्यों नहीं मिलते।।
-विपिन सिंह विरा...और पढ़ें
मां जमीन है तो पिता आसमान है
मेरे पिता ही मेरे भगवान् हैं
उनकी मुस्कुराहट पर जीवन कुर्बान हैं
वही मेरे धन है, वही मान है, सम्मान है
मेरे अस्तित्व की पहचान है
मेरे पिता ही मेरे भगवान् है
संतान की खुशियों के लि...और पढ़ें
मेरे रोम रोम में राम है कण कण में घनश्याम हैं
जीवन में हैं प्राण में हैं, हर क्षण में हैं हर एहसास में हैं
मेरी हर एक आश में हैं, जीवन के हर पल खास में हैं
कैसे कहूं कि
मेरे रोम रोम में राम हैं कण कण में घनश्याम हैं
...और पढ़ें
मनुष्यों के पास
होती हैं
पांच नहीं
बल्कि दस इंद्रियां
इनमें से पांच ज्ञानेंद्रियां
और पांच होती हैं
कर्मेंद्रियां
मिला लें इनके साथ
यदि मन को भी
तो हो जाती है
कुल इंद्रियों की संख्...और पढ़ें
हकीक़त को छुपाया जा रहा है
सभी को बरगलाया जा रहा है
बहारों को बुलाया जा रहा है
मगर गुलशन उजाड़ा जा रहा है
जहां से हम बचा लाए थे इसको
दिल ए गाफिल दोबारा जा रहा है
जड़ें इस पेड़ की गहरी बहुत हैं
करीने से उ...और पढ़ें
मुंह पर लगाना लगाम
है एक बहुत बड़ा काम
जिसने लगाया लगाम
मिलता उसको सलाम
करता काम वह तमाम
कमाता है वह नाम।
- सहज कुमार...और पढ़ें
चिड़ियों की बात निराली
बैठ जाती डाली डाली
रोके ना उसको हवा तूफानी
आसमान की है वह दीवानी
पंख खोल के उड़ना जानती
कभी ना वह डरना जानती
निडरता की पाठ पढ़ी है
कभी ना वह हार मानती
सुबह...और पढ़ें
करो प्रकाशित जीवन का हर दृश्य तुम्हारी आंखों में!
अगर हो हार तुम्हारी आंखों में तो है जीत तुम्हारी आंखों में
अगर हो डर तुम्हारी आंखों में,, तो है साहस तुम्हारी आंखों में।
करो प्रकाशित जीवन का हर दृश्य तुम्हारी आंखों में,,
...और पढ़ें