तू चाहिए न तेरी वफ़ा चाहिए मुझे
कुछ भी न तेरे ग़म के सिवा चाहिए मुझे
मरने से पहले शक्ल ही इक बार देख लूँ
ऐ मौत ज़िंदगी का पता चाहिए मुझे
या रब मुआ'फ़ कर के न दे कर्ब-ए-इंफ़िआल
मैं ने ख़ताएँ की हैं सज़ा चाहिए मुझे
ख़ामोशी-ए-हयात से उकता गया हूँ मैं
अब चाहे दिल ही टूटे सदा चाहिए मुझे
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