आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

ओम निश्चल: फिर भी सभी के बीच हिंदी का अलग ही ढंग है

कविता
                
                                                         
                            हैं ढेर सारी बोलियां 
                                                                 
                            
भाषाओं की हमजोलियां 
फिर भी सभी के बीच 
हिंदी का अलग ही ढंग है 
इसका अलग ही रंग है ।

मीठी है ये कितनी जबां 
इस पर सरस्वती मेहरबां 
कविता-कथा-आलोचना 
हर क्षेत्र में इसका  समां ;
सब रंक - राजा बोलते 
बातों में बातें तोलते 
महफिल में भर जाती खनक 
हर सिम्त उठती तरंग है 
इसका अलग ही  रंग है।

इसमें भरा अपनत्व  है 
भारतीयता का सत्व है 
इसके बिना तो संस्कृति 
औ सभ्यता निस्सत्व है 
इसमें पुलक आतिथ्य की 
इसमें हुलस मातृत्व की ;
मिलती है खुल के इस तरह 
जिस तरह मिलती उमंग है 
इसका अलग ही रंग है।

इस बोली में मिलती है लोरियां 
इस भाषा में झरती निबोरियां 
इस बोली में कृष्ण को छेड़ती 
गोकुल - बरसाने  की  छोरियां; 
कहीं पाठ चलता अखंड है 
कहीं भक्तिमय रस रंग है 
कहीं चल रहा सत्संग है
इसका अलग ही रंग है।
इसका अलग ही ढंग है।
 
एक दिन पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर