‘हम तो हैं परदेस में देस में निकला होगा चाँद’ में परदेश से देश की चिंता और ‘कालिदास के मेघदूत’ से महादेव को संदेश पहुँचाना साथ ही जीवन में साम्यवादी आदर्शों को अपनाना, असल मायने में भारतीयता के उस चित्र को दिखाता है जिसकी परिकल्पना सभी आदर्श पुरुषों ने की है। राही मासूम रज़ा इसी चित्र के सबसे महत्वपूर्ण रंग हैं, जिनकी रचनाओं में संपूर्ण भारतीय संस्कृति की छाप देखने को मिलती है। गाज़ीपुर के गंगोली गाँव में 1 सितंबर 1927 में जन्मे डॉ. राही मासूम रज़ा एक ऐसे रचनाकार के रूप में प्रतिष्ठित हुए जिनकी रचनात्मक उम्र संस्कृत से उर्दू तक और महाकाव्य से ग़ज़लों तक की रही है। भारतीय संस्कृति को गहराई से पहचानने वाले रज़ा साहब को रचना के लगभग हर क्षेत्र में बेशुमार शोहरत मिली। उपन्यास से लेकर काव्य तक और ग़ज़ल से लेकर फ़िल्म संवाद तक कोई भी ऐसा क्षेत्र नहीं जहाँ रज़ा साहब ने अपनी मज़बूत शैली के साथ हस्तक्षेप न किया हो। महाभारत के कभी ना भुलाए जा सकने वाले डायलॉग्स आज भी उनकी अद्भुत शैली का रंग बिखेरते हैं।
प्रेमचंद ने सृजन और साहित्य पर बात करते हुए कहा था, "सीमा के उल्लंघन में ही सीमा की मर्यादा है।" राही मासूम रज़ा की रचनात्मकता को इसी आधार पर समझा जा सकता है। यही कारण है कि एक तरफ रज़ा साहब लिखते हैं कि -
ऐ आवारा यादों फिर ये फ़ुर्सत के लम्हात कहाँ?
हमने तो सहरा में बसर की तुम ने गुज़ारी रात कहाँ?
तो दूसरी ओर अपने समाज की त्रासदी पर ‘गंगा और महादेव’ शीर्षक से कविता में कहते हैं -
मेरा नाम मुसलमानों जैसा है
मुझको क़त्ल करो और मेरे घर में आग लगा दो
मेरे उस कमरे को लूटो जिसमें मेरी बयाने जाग रही हैं
और मैं जिसमें तुलसी की रामायण से सरगोशी करके
कालीदास के मेघदूत से यह कहता हूँ
मेरा भी एक संदेश है।
मेरा नाम मुसलमानों जैसा है
मुझको क़त्ल करो और मेरे घर में आग लगा दो
लेकिन मेरी रग-रग में गंगा का पानी दौड़ रहा है
मेरे लहू से चुल्लू भर महादेव के मुँह पर फेंको
और उस योगी से कह दो- महादेव
अब इस गंगा को वापस ले लो
यह जलील तुर्कों के बदन में गढ़ा गया
लहू बनकर दौड़ रही है।
राही मासूम रज़ा कट्टरता के सख़्त विरोधी रचनाकार तो थे ही लेकिन उनका विरोध अपने अंदर एक मूल्यवान सांस्कृतिक पहचान को समेटे हुए था। वे जानते थे कि सामाजिक कुरीतियों का निवारण हमारी अपनी संस्कृति से ही निकल कर आएगी। इसीलिए न उनसे तुलसी छूट पाए और न कालिदास और इसीलिए वे कालिदास के मेघदूत से महादेव को संदेश पहुँचाने की बात करते हैं। विभाजन से आहत रज़ा साहब हमेशा मिली-जुली संस्कृति के पैरोकार रहे हैं। यही कारण था कि सिर्फ़ रचना के स्तर पर ही नहीं बल्कि राजनीतिक स्तर पर भी वे सामाजिक समानता के प्रति संघर्षरत रहे। जीवन में संघर्ष को उन्होंने बहुत ही कम उम्र में अनुभव किया था। बचपन में पोलियो की बीमारी के कारण उन्हें पढ़ाई तक छोड़नी पड़ी, लेकिन वे हार मानने वालों में से नहीं थे। उन्होंने फिर से पढ़ना शुरू किया और पी-एच.डी तक की पढ़ाई को पूरा किया। ज़िदगी को आज़माना जैसे रज़ा साहब के बचपने का खेल सा हो गया। इसी तरह वे अपने नज़्मों में भी संघर्ष को बड़े आशिकाना ढंग से पेश करते रहे -
"जहर मिलता रहा,
जहर पीते रहे
जिन्दगी भी हमें आजमाती रही
और हम भी उसे आजमाते रहे।"
अपनी ज़िंदादिल रचनाओं से रज़ा साहब ने जिंदगी के ज़ख़्मों को ऐसे पेश किया जिसे गुनगुनाते हुए जीने और उस जख़्म से बाहर निकलने का जज़्बा पैदा होता है। उनकी रचनाओं में एक खास क़िस्म की दीवानगी थी जिसमें एक अपनी ही अलग धुन थी। रज़ा साहब अपनी इसी धुन में रमे रहने वाले रचनाकार थे जो अलगाववादी व्यवहार में नहीं बल्कि समतावादी समाज में विश्वास रखते थे। उनके इस विश्वास को कट्टरपंथ के तर्कों से समझाना-बुझाना लगभव असंभव ही था। इसीलिए तो उन्होंने लिखा भी कि -
"हम क्या जानें किस्सा क्या था, हम ठहरे दीवाने लोग,
उस बस्ती के बाजारों में, रोज कहें अफ़साने लोग।"
राही मासूम रज़ा की पंक्तियाँ सिर्फ़ सुकून ही नहीं देती बल्कि आज के हालात पर हमें सोचने-समझने के लिए मजबूर भी करती हैं। आज हम जिस तरह से निरंकुशता की ओर बढ़ रहे हैं, वह चिंताजनक तो है ही साथ ही सामाजिक सरोकारों से संबंधित संस्थाओं द्वारा इन समस्याओं की लगातार उपेक्षा हमें उनकी कही बातों की ओर जाने को और अधिक मजबूर करती है। यही कारण है कि रज़ा साहब की नज़्मों में हमें आस्था का कर्मकांड नहीं बल्कि एक सांस्कृतिक विरासत का विस्तार देखने को मिलता है। उनकी इस विरासत में हिंदू हों या मुसलमान हों, सबके लिए अलगाववादी रुख़ के ठीक उलट, भाईचारे का संदेश होता है। रज़ा साहब की रचनाओं में भारतीय समाज के प्रति चिंता और दुःख की गहरी छाप को देखा जा सकता है। वे कहते हैं कि -
"लोग अपनों के खूं में नहाकर गीता और कुरान पढ़ें
प्यार की बोली याद है किसको, प्यार की बोली बोले कौन।"
कहने की आवश्यकता नहीं कि राही मासूम रज़ा का नाम भारतीय परंपरा के उन लेखकों में शुमार है जिनकी छाप साहित्य और समाज पर सिर्फ़ देखने को ही नहीं मिलती बल्कि उनका सृजन आज हमारी आवश्यकता भी बन गई है। इसीलिए उनकी पंक्तियाँ कभी कालिदास की याद ताज़ा कराती हैं तो कभी तुलसीदास की, कभी कबीर की तो कभी फ़ैज़ की। प्रेम से नफ़रतों को भुलाने के पुरज़ोर समर्थक राही मासूम रज़ा की याद उनकी बहुमूल्य रचनाओं के कारण आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जैसा बीते हुए कल में थी और जैसा आने वाले कल में होगी। भाग-दौड़ की इस नई संस्कृति में उनकी प्यारी गंगा-जमुना की निश्च्छलता से भरी नज़्में हमारे अंदर एक ठहराव पैदा करती हैं। उन नज़्मों के बगैर यह समाज ठीक वैसे ही है जैसे उनकी नज़्मों में चाँद के बगैर ख़ुद राही मासूम रज़ा -
हम तो हैं परदेस में, देस में निकला होगा चांद
अपनी रात की छत पर, कितना तनहा होगा चांद
जिन आँखों में काजल बनकर, तैरी काली रात
उन आँखों में आँसू का इक, कतरा होगा चांद
रात ने ऐसा पेंच लगाया, टूटी हाथ से डोर
आँगन वाले नीम में जाकर, अटका होगा चांद
चांद बिना हर दिन यूँ बीता, जैसे युग बीते
मेरे बिना किस हाल में होगा, कैसा होगा चांद
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