हमारे साहिर लुधियानवी अपनी माँ सरदार बेग़म के लिए अब्दुल हयी थे। माँ थी तो पिता भी होने थे। यह एक जैविक मज़बूरी थी। जो अनिवार्यतः घटित होनी थी। सो घटित हुई और अब्दुल हयी के पिता हुए फ़ज़ल मुहम्मद। लुधियाना के एक रईस जागीरदार।
कुछ दुख हमारे होने से पहले हमारे जीवन में मौजूद होते हैं। वो हमारा इंतज़ार कर रहे होते हैं। अब्दुल हयी के जीवन का दुख, उनके जन्म से पहले ही उनका इंतज़ार कर रहा था। उनकी 12 माएँ थीं और एक पिता। ये कहानीनुमा बात अब्दुल हयी के जीवन का यथार्थ थी। इसे ही शायद जादुई यथार्थवाद कहते हैं। जहाँ कुछ असंगत, कहानीनुमा, काल्पनिक सी बात यथार्थ में घटित होती है। अब्दुल हयी के जीवन के इसी तल्ख़ जादू ने उन्हें हर्फ़ों का जादूगर बना दिया। और वो अब्दुल हयी से शायर साहिर लुधियानवी बन गए। साहिर का शाब्दिक अर्थ जादूगर होता है।
साहिर की माँ उनके पिता की ग्यारवीं बीवी थीं। जब उनके पिता ने बाहरवीं शादी की तो उनकी माँ सरदार बेग़म का ये भरम भी जाता रहा कि वो पुत्र प्राप्ति के लिए शादी कर रहे हैं। अब आईने से गर्द हट चुकी थी और उनकी माँ को ये एहसास हो गया था कि उनका शौहर एक अय्यास आदमी है। जिसके लिए औरतें जिस्म की भूख का सामान और अय्यासी का साधन मात्र हैं। जो जितना रईस होता है उसके पास उतनी विलासिता के साधन होते हैं। उतने ही विकल्प। अब साहिर की माँ ख़ुद को अपने पति की नज़रों में किसी वस्तु, भोग का साधन, विलासिता के विकल्प से ज़्यादा नहीं देख पा रहीं थी। ऐसे ही उलझे हुए खयालों और सवालों वाली किसी रात उन्होंने तय किया कि वो अपने पति के साथ नहीं रहेंगी।
उनके पति के पास बहुत सी औरतें थीं पर बेटा एक था। बेटा सिर्फ़ बेटा नहीं होता वह कुल का दीपक भी होता है। और कुल तो सिर्फ़ पुरुषों का होता है। महिलाओं का कोई कुल नहीं होता। सो मामला अदालत में पहुँच गया। मसअला था साहिर पर हक़ का। अदालत में नन्हें साहिर ने अपनी माँ को चुना। और अदालत ने बच्चे को माँ की ज़्यादा ज़रूरत है, के सिद्धांत के आधार पर साहिर को उनकी माँ सरदार बेग़म को सौंप दिया। ये साधारण सी घटना मर्दवादी मस्तिष्क पर आघात थी। कुल का चराग़ एक औरत कैसे हथिया सकती है। वो तो बेटा पैदा करने की मशीन भर है। पितृसत्ता की नज़र में बेटा पिता की खेती है। उसके पौरुष का फल। तो साहिर का उनकी माँ के पास जाना उनके पिता फ़ज़ल मुहम्मद को अखर गया और उन्होंने अपने कारिंदे उन्हें ख़त्म करने के लिए लगा दिए। ये ऐसे ही था जैसे जो वस्तु मेरी नहीं वो किसी और की नहीं हो सकती। एक जीती जागती जान का, एक इंसानी बच्चे का वस्तु में बदल जाना कितना त्रासद हो सकता है ये साहिर और उनकी माँ ही समझ सकते थे। साहिर की माँ ने अपने गहने ज़ेवरात बेंच कर अपने बच्चे के लिए अंग रक्षक रखे। ताकि वो उसे अपने पति के हाथों मारे जाने से बचा सकें।
साहिर की स्मृति में बचपन की वह शाम बदस्तूर ताउम्र दस्तक देती रही, जिसमें एक ट्रेन धड़धड़ाते हुए गुज़र रही थी और 13 साल के साहिर अपनी माँ से लिपट जाते हैं और रोते हुए अपनी माँ से कहते हैं " अम्मी मुझे रेलगाड़ी से बहुत डर लगता है, वापस अपने घर चलो ना ! साहिर कभी नहीं भूल पाए उस भाव को जो उस वक़्त उनकी माँ की आँखों में उभरा था। और वो रंग भी जिससे यकबयक उनकी माँ का चेहरा सन गया था। उन्होंने अपने बच्चे को अपने सीने में भींचते हुए कहा था "वो घर हमारा नहीं है। अब हम वहाँ कभी वापस नहीं जा सकते। अपने अब्बा को भूल जाओ, वो ज़ालिम आदमी है। वो तुमसे और मुझसे नफ़रत करता है। उसने तुम्हें मारने का अहद (प्रण) लिया है"। सरदार बेग़म ना जाने किस बदहवासी, किस कैफ़ियत में ये एक साँस में कह गईं थीं कि उनका कहा साहिर ताउम्र कभी नहीं भुला सके। साहिर और उनकी माँ एक साथ रो रहे थे। एक दूसरे से लिपटे हुए। साहिर सिसकियाँ भरते हुए माँ से कह रहे थे "अम्मी! वादा करो तुम मुझे छोड़ कर कभी नहीं जाओगी"। माँ सरदार बेग़म ने साहिर के आँसू पोछते हुए कहा था "मैं वादा करतीं हूँ, मेरे बच्चे, तुझे कभी छोड़ कर नहीं जाऊँगी"।
वादे अक्सर टूट जाते हैं। दरअसल वादों की नियति ही टूट जाना है। माँ का ये वादा भी टूट गया। साल था 1978 का माँ साहिर को छोड़ कर हमेशा हमेशा के लिए चली गईं। कहाँ ? एक ऐसी जगह जिसका पता किसी को नहीं मालूम। समझदार लोग नासमझी में उसे अल्लाह मियां का घर कहते हैं और धर्म की किताब जन्नत। पर साहिर की जन्नत तो उनकी माँ के क़दमों में थी। सो साहिर माँ के जाने के बाद भीतर से दरकने लगे। और उनके हिस्से की तन्हाई माँ के जाने के बाद और बढ़ गई। माँ के जाने के बाद दुनिया का साहिर लुधियानवी और अपनी माँ का अब्दुल हयी दो साल भी नहीं जी सका। और 25 अक्टूबर 1980 की रात शराब की नीम बेहोशी में मौत के आग़ोश में समा गया। मौत की वजह हार्ट अटैक थी। उनके दिल पर हमले तो उनके जन्म से पहले ही होते रहे। माँ के गर्भ में रहते हुए ही उनके दिल के टूटने का सिलसिला चल निकला था और माँ के जाने के साथ ही दिल एकदम टूट चुका था, जिसे चकनाचूर होने में दो साल लगे और अखरियत में 25 अक्टूबर 1980 को साहिर की कहानी में पूर्णविराम वाली रात आई। माँ की रुखसती के साल ही फ़िल्म त्रिशूल (1978) आई थी। जिसमें उन्होंने अपनी माँ के जीवन संघर्ष, उनकी ज़िद्द और उनके सपनों को गीत में ढाल दिया था। एक सिंगल मदर की परम अभिलाषा का शाब्दिक चित्र।
गीत यूँ था--
तू मेरे साथ रहेगा मुन्ने
ताकि तू जान सके
तुझको परवान चढाने के लिए
कितने संगीन मराहिल से तेरी माँ गुजरी
तू मेरे साथ रहेगा मुन्ने
ताकि तू देख सके
कितने पाँव मेरे ममता के कलेजे पे पड़े
कितने खंज़र मेरी आँखों में, मेरे कानों में पड़े
तू मेरे साथ रहेगा मुन्ने
मैं तुझे रहम के साये में ना पलने दूँगी
जिंदगानी की कड़ी धूप में जलने दूँगी
ताकि तप तप के तू फौलाद बने
माँ की औलाद बने, माँ की औलाद बने
तू मेरे साथ रहेगा मुन्ने
जब तलक होगा तेरा साथ निभाऊंगी मैं
फिर चली जाऊँगी उस पार सन्नाटों में
और तारों से तुझे झांकूंगी
ज़ख्म सीने में लिए खून निगाहों में लिए
तेरा कोई भी नहीं मेरे सिवा
मेरा कोई भी नहीं तेरे सिवा
तू मेरे साथ रहेगा मुन्ने तू मेरे साथ रहेगा मुन्ने
तू मेरे साथ रहेगा मुन्ने
मेरा हर दर्द तुझे दिल में बसाना होगा
मैं तेरी माँ हूँ मेरा क़र्ज़ चुकाना होगा
मेरी बर्बादी के ज़ामिल अगर आबाद रहे
मैं तुझे दूध ना बख्शूंगी तुझे याद रहे
मैं तुझे दूध ना बख्शूंगी तुझे याद रहे
तुझे याद रहे तुझे याद रहे
तू मेरे साथ रहेगा मुन्ने
साहिर की सारी जिंदगी इस एक गीत की रोशनी में देखी जा सकती है। उनके जन्म से लेकर मृत्यु तक के संघर्ष की कहानी इसी एक गीत में साहिर ने पिरो दिया था। उनके जीवन में उनकी माँ के अलावा अस्ल में कोई नहीं था। वो जहाँ भी जाते अपनी माँ को साथ लिए रहते। फ़िल्म की शूटिंग, गीतों की लॉन्चिंग, कोई मीटिंग, अवार्ड फंक्शन कहीं भी। उनके जीवन में सबकुछ अधूरा छोड़ देने की उनकी सनक उनकी माँ के जीवन के अधूरेपन की प्रतिध्वनि थी। अमृता ने जिसे रशीदी टिकट लिखते हुए दर्ज़ किया उनकी आधी पी हुई सिगरेट को अपने हिस्से करते हुए। उन्होंने स्त्री के जीवन की त्रासदी को बरास्ते अपनी माँ भोगा था और उसे अपनी शायरी में आवाज़ भी दी थी।
उन्होंने लिखा---
औरत ने जन्म दिया मर्दों को, मर्दों ने उसे बाज़ार दिया
जब चाहा मसला, कुचला जब चाहा दुत्कार दिया
मर्दों के लिए हर जुल्म रवा, औरत के लिए रोना भी खता
मर्दों के लिए लाखों सेजें, औरत के लिए बस एक चिता
साहिर अपनी माँ के जीवन संघर्ष का आईना थे और उस आईने में उभरा हुआ अक्स उनकी शायरी। उन्होंने अपनी माँ के साथ हुए अन्याय को माँ के साथ भोगा था। इसलिए उनका यक़ीन दुनिया और ख़ुदा दोनों से उठ गया था। इसलिए वो उस सुबह के इंतज़ार में जब हर ज़ुल्म-ओ-सितम मिट जाएगा गाते रहे, "वो सुबह कभी तो आएगी" और साथ ही दुनिया को लानत भेजते हुए कहते रहे "ये दुनिया दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है"
साहिर अपनी माँ के जीवन में उनके पति के प्रेम अभाव को अपने प्रेम गीतों से पकड़ते रहे और भीतर भीतर बग़ावत का परचम लिए फिरते रहे। तभी साहिर के दोस्त और अज़ीम शायर कैफ़ी आज़मी ने साहिर की याद में कभी कहा था "साहिर के दिल में तो परचम है पर उसकी कलम कागज़ पर मुहब्बत के नग़में उकेरती है"। आख़री में मुझे अगर साहिर की शायरी और शख्सियत के बारे में एक वाक्य कहना हो तो मैं कहूँगा "साहिर की शायरी उनकी माँ की पीड़ा से उठती हुई भाप की तासीर थी"।
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