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देश क़ी मांग

                
                                                         
                            देश का विकास हो, भ्रष्टाचारियों का नाश हो।
                                                                 
                            
उन्नति का पथ हो, नारियों के नथ हो।
आँखों में शर्म हो, भाग्यशाली कर्म हो।
व्यवहार में शालीनता, लम्बी चलेगी मित्रता।
प्यार भरी बोली हो, हम मस्तों की टोली हो।
रेप गानों का अन्त हो, बिहारी, निराला, पंत हो।
खिलाड़ियों का खेल हो, सब धर्मों का मेल हो।
चाणक्य की नीति हो, नेताओं में प्रीति हो।
थाली में प्याज हो, धन बिन ब्याज हो।
युवाओं में जोश हो, व्यवसाय में न लोस (loss) हो।
शिक्षित नौजवान हो, कर्मवीर इंसान हो।
चारों तरफ खुशहाली हो, दूर तंगहाली हो।
कोई भी ना मजबूर हो, हिंसा भी तो दूर हो।
व्यवहार सबका नेक हो, सब धर्म एक हों।
कद्रदानों की ना कमी हो, भूमि में नमी हो।
पशुओं को चारा हो, नेताओं को देश प्यारा हो।
बुजुर्गों का मान हो, मानसून मेहरबान हो।
सबमें सदाचार हो, केवल एक ही विचार हो।
खुशियों की तह हो, भारत माँ की जय हो।
 -अभिषेक धामा
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एक घंटा पहले

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