ग़म-सितम, इल्जाम ले बैठा।
तब कहीं मैं जाम ले बैठा।
लोग होंगे बेवफ़ा जग में,
मैं तुम्हारा नाम ले बैठा।।
आशिक़ी में कुछ कहाँ मिलता
कौन-सा ये काम ले बैठा।
कर लिया वो प्यार का सौदा,
दो बखत का दाम ले बैठा।
ज़िंदगी भर है मुझे रोना
याद का जो ताम ले बैठा।
-अजय साहनी
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