ये जिंदगी अब और क्या चाहे
इतना सितम मासूम कंधे पर क्यों ढाहे
जो तड़पता रहा तमाम उम्र इस दुनिया में
भला वो मरने के बाद कैसे स्वर्ग चाहे
उसके महबूब ने उसको आवाज लगा दी है
और वो अपने कब्र से निकलना चाहे
हम महफ़िल में आकर भी अकेले रहे
और उससे हर कोई मिलना चाहे
उसकी याद जब आंख में आशु बनकर आ जाए
मेरा मन फिर भी इस बात से मुकरना चाहे
उम्र कही भी गुजर जाए कमाने में ग़म नहीं
जब गिरू तो सर मां के आंचल में होना चाहे
गौतम नहीं रही कदर सबकी कदर करने वालों कि
क्या करे जब हर कोई हुस्न वालों का होना चाहे
- ऐ. के. गौतम
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X