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खाली ज़ेब खटकते हैं

                
                                                         
                            खाली ज़ेब खटकते हैं
                                                                 
                            
सारे हाथ झटकते हैं।

घर तेरा बच्चे तेरे
हम दिन-रात भटकते हैं।

देख लिया क़र्ज़े वाले
शूली झूल लटकते हैं।

दौलत बिन सब कुछ सूना
खाली माथ पटकते हैं।

होश अनिल ग़ुम नौकर का
मालिक माल गटकते हैं।
-पंडित अनिल
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एक घंटा पहले

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