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मेरा आकाश

                
                                                         
                            वो अकेली ही थी
                                                                 
                            
उस नदी के किनारे
शाम का धुंधलका था
और उसके आने की कोई आहट न थी ।
एक पहर बीता, दो पहर भी बीत गया
तीसरा पहर भी बीत गया
पर उसे न आना था
और न ही वो आया ।
समस्या थी, जिसे पीछे छोड़ आई
वहाँ वापस जाना संभव ना था
और आगे का रास्ता अनिश्चित,अघोषित
क्या करे , कहाँ जाए ?
हर मोड़ पर असुरक्षा मौजूद थी
उसने अपने मन की कसौटी पर तन कसा
कठोर निर्णय ले कर चल पड़ी
अपनी मंज़िल तलाशने ।
समय और समाज को दिखाने
कि मैं अकेली नहीं,
आत्मविश्वास और समझ है मुझमें,
नीला खुला गगन था सामने
और चुनौतियाँ व संभावनाएं असीमित।
-माला शर्मा
 
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एक घंटा पहले

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