प्यास बुझती नहीं,भूख मिटती नहीं
जिंदगी ऐसी बिखरी,सिमटती नहीं
मुद्दतों से ये आलम चला आ रहा
दिन गुजरता नही,रात कटती नहीं
हो गई कोई,नासूर अब जिंदगी
जख्म भरते नहीं,धरती फटती नहीं
पात झड़ने लगे, कलियां खिलती नहीं
अब बहारें चमन से गुजरती नहीं
दिल को पत्थर किया, अश्क भी पी लिया
दिलरुबा अब बिछड़ने से डरती नहीं
कैसे समझा लिया, मन कड़ा कर लिया
अब तमन्नाएं कुछ शोर करती नहीं
ये कोई रोग हे,या कोई सोग है
नींद आंखों पे मेरे उतरती नहीं
पीछे क्या हो गया,आगे होना है क्या
जिंदगी अपने पन्ने पलटती नहीं
इक उदासी कोई रूह में दफ्न है
सांस लेती नहीं,और मरती नहीं
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X