सब कुछ शक्ति के इर्द-गिर्द घूम रहा है,
हर कोई बस शक्तिशाली होना चाहता है,
कोई सत्ता के सहारे,
कोई ऊँचे पद के सहारे,
कोई धन के पहाड़ खड़े करके—
बस आगे निकल जाना चाहता है।
हम दौड़ रहे हैं,
एक-दूसरे को पीछे छोड़ते हुए,
कभी-कभी एक-दूसरे को कुचलते हुए भी,
पर किसी ने यह पूछना ज़रूरी नहीं समझा—
आख़िर पहुँचना कहाँ है?
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