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गुम हुई भाषा

                
                                                         
                            एक व्यंग्यात्मक कविता — अपनी ही ज़ुबान से दूर होते समाज पर
                                                                 
                            
भाषा कहीं गुम हो गई है, शब्दों की नीलामी है, अपनी बोली बोलने में अब, लोगों को शर्मिंदगी है।
माँ ने जो लोरी गाई थी, दादी की जो कहानी थी, जिन शब्दों में प्यार बसा था, वो भाषा अब बेगानी है।
अंग्रेज़ी में हँसते बच्चे, हिंदी बोलें तो शरमाते, अपनी भाषा के शब्दों को, पिछड़ेपन का नाम बताते।
घर में मम्मी, डैडी रहते, दादी हुईं बस ओल्ड कहानी, मातृभाषा कोने में बैठी, देख रही दुनिया अनजानी।
वाह रे आधुनिकता के ठेकेदारों, वाह तुम्हारी शान! अपनी भाषा भूल गए तुम, फिर भी करते अभिमान!
नेता जी जब भाषण देते, भाषा पर सम्मान जताते, मंच से हिंदी का गुण गाकर, अंग्रेज़ी में फ़ाइल चलाते।
कवि सम्मेलन में कवि बोले, भाषा का उत्थान करेंगे, तालियाँ मिलते ही बोले— “थैंक्यू! फिर मुलाकात करेंगे!”
मोबाइल की इस दुनिया में, शब्द हुए सब छोटे-छोटे, भावनाओं के लंबे किस्से, अब इमोजी में सिमटे-सिमटे।
'नमस्ते' को हाय बना दिया, 'धन्यवाद' को थैंक्यू, अपनी बोली भूलकर बोले, देखो, आई एम सो कूल!
गाँवों की वो मीठी बोली, खेतों जैसी महक कहाँ है? शहरों में सब बोल रहे हैं, पर बातों में लचक कहाँ है?
दादी कहती— “बेटा सुन ले,” पोता बोला— “स्पीक इन इंग्लिश!” दादी चुप, पोता खुश था, जीत गई थी उसकी स्वैगिश!
भाषा केवल शब्द नहीं है, यह पुरखों की थाती है, इसमें माँ की ममता बसती, इसमें मिट्टी गाती है।
जिस भाषा में पहला आँसू, पहली किलकारी निकली, उसी भाषा को भूलकर देखो, कितनी बड़ी समझदारी निकली!
अब तो भाषा ढूँढ़ रहे हैं, सम्मेलनों के गलियारों में, सम्मान-पत्र छपते मिलते, अपनी बोली के हत्यारों में!
न हिंदी से बैर हमारा, न अंग्रेज़ी से दूरी है, पर अपनी जड़ काटकर जीना, कैसी यह मजबूरी है?
आओ, थोड़ा होश में आएँ, अपनी बोली को अपनाएँ, दुनिया की हर भाषा सीखें, पर अपनी जड़ न भूल जाएँ।
कल जब बच्चे पूछेंगे हमसे, “दादाजी, वो भाषा क्या थी?” क्या कह देंगे— “गुम हो गई वो, जिसमें अपनी दुनिया बसी थी!”
— दिनेश उनियाल
 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक घंटा पहले

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