प्यार के अनेकों वादें की तुम ने मुझे से, पर निभाए एक भी नहीं,
मैं कितना तड़पा, कितना रोया, कितना बर्बाद हुआ, तुम्हें इससे क्या,
और उल्टे इल्जाम पर इल्ज़ाम तुम लगाती गई मुझ पर, पर तुम्हें इससे क्या,
लेकिन बावजूद इसके सुबह जब भी आंखें खुलती हैं, तेरी सूरत नज़र आती है,
आदत, दिल से मजबूर हूं,रात तेरी तस्वीर ना देख लूं, नींद नहीं आती,
आज भी बैठकर तेरा इंतज़ार करता हूं, शायद तुम एक बार मिल जाओ,
तुम्हारे बिना सब कुछ वैसा ही है सिर्फ मैं बदल गया हूं,
खैर तुम को क्या फर्क पड़ता है तुम ने सिर्फ प्यार करना छोड़ दिया,
मैं कितना तड़पा, कितना रोया, कितना बर्बाद हुआ, तुम्हें इससे क्या
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