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ग़ज़ल

                
                                                         
                            झूठ की बुनियाद पर ऊँचा मकाँ होता नहीं,
                                                                 
                            
सच अगर ज़िंदा हो तो फिर कुछ निहाँ होता नहीं।

बेचकर ज़मीर जो दौलत कमाने लग गए,
उनके चेहरों पर कभी नूर-ए-जवाँ होता नहीं।

धूप कितनी भी कड़ी हो, हौसला मत छोड़िए,
हौसलों के सामने कोई धुआँ होता नहीं।

वक़्त जब इंसाफ़ करता है झुकाता ताज भी,
ज़ुल्म का अंजाम हरगिज़ रायगाँ होता नहीं।

दिल में उल्फ़त हो तो पत्थर भी पिघल जाते हैं,
नफ़रतों से कोई भी घर गुलसिताँ होता नहीं।

जिसने माँ-बाप की ख़िदमत को इबादत जान ली,
उसके हिस्से में कभी रंजो-फ़ुगाँ होता नहीं।

 
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6 घंटे पहले

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